चिडिया की बच्ची की कहानी

चिडिया की बच्ची
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माधवदास ने अपनी संगमरमर की नयी कोठी बनवाई है । उसके सामने बहुत सुहावना बगीचा भी लगवाया है । उनको कला से बहुत प्रेम है । धन की कमी नहीं है और कोई व्यसन छू नहीं गया है । सुंदर अभिरुचि के आदमी हैं । फूल – पौधे . रिकाबियों से हौजों में लगे फव्वारों में उछलता हुआ पानी उन्हें बहुत अच्छा लगता है । समयें भी उनके पास काफ़ी है । शाम को जब दिन की गरमी ढल जाती है और आसमान कई रंग का हो जाता है तब कोठी के बाहर चबूतरे पर तख्त डलवाकर मसनद के सहारे वह गलीचे पर बैठते हैं और प्रकृति की छटा निहारते हैं । इनमें मानो उनके मन को तृप्ति मिलती है । मित्र हुए तो उनसे विनोद – चर्चा करते हैं , नहीं तो पास रखे हुए फर्शी हुक्के की सटक को मुँह में दिए खयाल ही खयाल में संध्या को स्वप्न की भाँति गुजार देते हैं । आज कुछ – कुछ बादल थे । घटा गहरी नहीं थी । धूप का प्रकाश उनमें से छन – छनकर आ रहा था । माधवदास मसनद के सहारे बैठे थे । उन्हें जिंदगी में क्या स्वाद नहीं मिला है ? पर जी भरकर भी कुछ खाली सा रहता है ।

सामने की गुलाब की डाली पर एक की गरदन लाल थी और गुलाबी नाई थी । पंख ऊपर सचमकदार स्याह र शरीर पर चित्र – विचित्र उस दिन संध्या समय उनके देखते – देखते सामने को चिडिया आन बैठो । चिड़िया बहुत सुंदर थी । उसकी गरदन ला होते – होते किनारों पर जरा – जरा नीली पड़ गई थी । पंख ऊपर से थे । उसका नन्हा सा सिर तो बहुत प्यारा लगता था और शरीर पर नि चित्रकारी थी । चिड़िया को मानो माधवदास की सत्ता का कुछ पता नहीं था मानो तनिक देर का आराम भी उसे नहीं चाहिए था । कभी पर हिलाती थी . फुदकती थी । वह खूब खुश मालूम होती थी । अपनी नन्ही सी चोंच प्यारी – प्यारो आवाज निकाल रही थी । माधवदास को वह चिड़िया बड़ी मनमानी लगी । उसकी स्वच्छंदता बड़ी प्यारी जान पड़ती थी । कुछ देर तक वह उस चिड़िया का इस डाल से उस डाल थिरकना देखते रहे । इस समय वह अपना बहुत – कुछ भूल गए । उन्होंने उस चिड़िया से कहा , “ आओ , तुम बड़ी अच्छी आई । यह बगीचा तुम लोगों के बिना सूना लगता है । सुनो चिड़िया तुम खुशी से यह समझो कि यह बगीचा मैंने तुम्हारे लिए ही बनवाया है । तुम बेखटके यहाँ आया करो । ” चिड़िया पहले तो असावधान रही । फिर जानकर कि बात उससे की जा रही है . वह एकाएक तो घबराई । फिर संकोच को जीतकर बोली . “ मझे मालम नहीं था कि यह बगीचा आपका है । मैं अभी चली जाती हैं । पलभर साँस लेने में यहाँ टिक गई थी । ” माधवदास ने कहा , ” हाँ , बगीचा तो मेरा है । यह संगमरमर की कोठी भी मेरी है । लेकिन , इस सबको तुम अपना भी समझ सकती हो । सब कुछ तुम्हारा है । तुम कैसी भोली हो . कैसी प्यारी हो । जाओ नहीं , बैठो । मेरा मन तुमसे बहुत खुश माफ़ करें ” चिड़िया बहुत – कुछ सकुचा गई । उसे बोध हआ कि यह उससे गलती तो नह । हुई कि वह यहाँ बैठ गई है । उसका थिरकना रुक गया । भयभीत – सी वह बाल ” मैं थककर यहाँ बैठ गई थी । मैं अभी चली जाऊँगी । बगीचा आपका है ।
न्याह चत्र चिड़िया की बच्ची 24 माधवदास ने कहा , ” मेरी भोली चिड़िया , तुम्हें देखकर मेरा चित्त प्रफुल्लित हुआ है । मेरा महल भी सूना है । वहाँ कोई भी चहचहाता नहीं है । तुम्हें देखकर मेरी रागनियों का जी बहलेगा । तुम कैसी प्यारी हो , यहाँ ही तुम क्यों न रहो ? ” चिड़िया बोली , ” मैं माँ के पास जा रही हैं . सरज की धुप खाने और हवा से । खेलने और फूलों से बात करने मैं जरा घर से उड़ आई थी , अब साँझ हो गई है और माँ के पास जा रही हैं । अभी – अभी मैं चली जा रही हूँ । आप सोच न करें । ” । माधवदास ने कहा , ” प्यारी चिड़िया , पगली मत बनो । देखो , तुम्हारे चारों तरफ़ कैसी बहार है । देखो , वह पानी खेल रहा है , उधर गुलाब हँस रहा है । भीतर महल में चलो , जाने क्या – क्या न पाओगी ! मेरा दिल वीरान है । वहाँ कब हँसी सुनने को मिलती है ? मेरे पास बहुत सा सोना – मोती है । सोने का एक बहुत सुंदर घर मैं तुम्हें बना दूंगा , मोतियों की झालर उसमें लटकेगी । तुम मुझे खुश रखना । और तुम्हें क्या चाहिए ! माँ के पास बताओ क्या है ? तुम यहाँ ही सुख से रहो , मेरी भोली गुड़िया । ” चिड़िया इन बातों से बहुत डर गई । वह बोली , “ मैं भटककर तनिक आराम के लिए इस डाली पर रुक गई थी । अब भूलकर भी ऐसी गलती नहीं होगी । मैं अभी यहाँ से उड़ी जा रही हूँ । तुम्हारी बातें मेरी समझ में नहीं आती हैं । मेरी माँ के घोंसले के बाहर बहुतेरी सुनहरी धूप बिखरी रहती है । मुझे और क्या करना है ? दो दाने माँ ला देती है और जब मैं पर खोलने बाहर जाती हूँ तो माँ मेरी बाट देखती रहती है । मुझे तुम और कुछ मत समझो , मैं अपनी माँ की हूँ । ” 69
बस चिड़िया , ” दो बहिन , एक भाई । पर मुझे देर हो रही है । ” ” हाँ हाँ जाना । अभी ता उजेला है । दो बहन , एक भाई है ? बड़ी अच्छी बात है । ” पर चिड़िया के मन के भीतर जाने क्यों चैन नहीं था । वह चौकन्नी हो – हो चारों ओर देखती थी । उसने कहा , “ सेठ मुझे देर हो रही है । ” सेठ ने कहा , “ देर अभी कहाँ ? अभी उजेला है , मेरी प्यारी चिड़िया ! तुम अपने घर का इतने और हाल सुनाओ । भय मत करो । ” चिडिया ने कहा , “ सेठ मुझे डर लगता है । माँ मेरी दूर है । रात हो जाएगी तो राह नहीं सूझेगी । ” इतने में चिड़िया को बोध हुआ ॐ कि जैसे एक कठोर स्पर्श उसके देह को छू गया । वह चीख देकर चिचियाई और एकदम उड़ी । नौकर के फैले हुए पंजे में वह आकर भी नहीं आ सकी । तब वह उड़ती हुई एक साँस में माँ के पास गई और माँ की गोद में गिरकर सुबकने लगी , ” ओ माँ , ओ माँ ” 
चिड़िया की बच्ची एकमाँ ने बच्ची को छाती से चिपटाकर पळा ” क्या है मेरी बच्ची , क्या है ? ” ” पर , बच्ची काँप – काँपकर माँ की छाती से और चिपक गई , बोली कुछ नहीं , तो बस सुबकती रही , ” ओ माँ , ओ माँ ! ” ई बड़ी देर में उसे ढाढस बँधा और तब वह पलक मींच उस छाती में ही विपककर सोई । जैसे अब पलक न खोलेगी । 
 प्ररन – अध्यास कहानी से 1 . किन बातों से ज्ञात होता है कि माधवदास का जीवन संपन्नता से भरा था और किन बातों से ज्ञात होता है कि वह सुखी नहीं था ? 2 माधवदास क्यों बार – बार चिड़िया से कहता है कि यह बगीचा तम्हारा ही है ? क्या माधवदास नि : स्वार्थ मन से ऐसा कह रहा था ? स्पष्ट कीजिए । 3 . माधवदास के बार – बार समझाने पर भी चिड़िया सोने के पिंजरे और सुख – सुविधाओं को कोई महत्त्व नहीं दे रही थी ।

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